आधुनिककालीन हिंदी भाषा और साहित्य का इतिहास/छायावादी काव्य आंदोलन और उसके प्रमुख कवि

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'छायावाद' शब्द के अर्थ के संबंध में विभिन्न विद्वानों के मत हैं किंतु कोई एक निश्चित परिभाषा कभी नियत नहीं हो सकी। 'छायावाद' शब्द का प्रथम प्रयोग 1920 में मुकुटधर पांडेय ने जबलपुर से छपने वाली 'श्री शारदा' नामक पत्रिका में लिखे अपने एक लेख 'हिंदी में छायावाद' में किया।[1] मुकुटधर पांडेय ने अपने निबंध में छायावाद की पाँच विशेषताओं का उल्लेख किया, जो इस प्रकार हैं –– वैयक्तिकता, स्वातंत्र्य चेतना, रहस्यवादिता, शैलीगत वैशिष्ट्य और अस्पष्टता। इसी दौरान जून 1921 में 'सरस्वती' पत्रिका में सुशीलकुमार ने "हिंदी में छायावाद" शीर्षक एक संवादात्मक निबंध का उल्लेख मिलता है। यह एक व्यंग्यात्मक निबंध था जिसमें चार लोगों के संवाद के माध्यम से छायावादी कविता में अभिव्यक्ति कि अस्पष्टता पर टिप्पणी की गई थी।[2] विभिन्न विद्वानों ने 'छायावाद' की जो व्याख्या प्रस्तुत की उनमें से कुछ प्रमुख विद्वानों की व्याख्याएँ निम्नवत् हैं ––

  • महावीर प्रसाद द्विवेदी : "छायावाद से लोगों का क्या मतलब है, कुछ समझ नहीं आता। शायद उनका मतलब है कि किसी-कविता के भावों की छाया यदि कहीं अन्यत्र जाकर पड़े तो उसे छायावादी कविता कहना चाहिए।"[3]
  • रामचंद्र शुक्ल : "छायावाद शब्द का प्रयोग दो अर्थों में समझना चाहिए। एक तो रहस्यवाद के अर्थ में जहाँ उसका संबंध काव्यवस्तु से होता है अर्थात् जहाँ कवि उस अनंत और अज्ञात प्रियतम को आलंबन बनाकर अत्यंत चित्रमयी भाषा में प्रेम की अनेक प्रकार से व्यंजना करता है।... 'छायावाद' शब्द का दूसरा प्रयोग काव्यशैली या पद्धति-विशेष के व्यापक अर्थ में है।"[4]
  • नंददुलारे वाजपेयी : "मानव अथवा प्रकृति के सूक्ष्म किंतु व्यक्त सौंदर्य में आध्यात्मिक छाया का भान मेरे विचार से छायावाद की एक सर्वमान्य व्याख्या हो सकती है।"[5]
  • हजारीप्रसाद द्विवेदी : "छायावाद शब्द केवल चल पड़ने के जोर से ही स्वीकारणीय हो सका है, नहीं तो इस श्रेणी की कविता की प्रकृति को प्रकट करने में यह शब्द एकदम असमर्थ है। बहुत दिनों के तक इस काव्य का उपहास किया गया है और बाद में इसे या तो चित्रभाषा-शैली या प्रतीक-पद्धति के रूप में माना गया या फिर रहस्यवाद के अर्थ में।"[6]
  • डॉ॰ नगेन्द्र : "छायावाद स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह है।"[5][7]
  • नामवर सिंह : "जिस तरह अन्य साहित्यों में अनेक प्रवृत्तियों के पुंज रोमैंटिक काव्य को एक संज्ञा 'रोमैंटिसिज्म' दी गई है, उसी तरह अनेक प्रवृत्तियों के पुंज छायावादी काव्य को भी एक ही नाम देना चाहिए। कहना न होगा कि यह एक नाम छायावाद ही हो सकता है। छायावाद नाम सबसे पुराना होने के साथ ही प्रसाद, निराला, पंत और महादेवी की कविता के लिए रूढ़ भी हो गया है। ऐसी हालत में 'छायावाद' शब्द का अर्थ चाहे जो हो, परंतु व्यावहारिक दृष्टि से यह प्रसाद, निराला, पंत, महादेवी की उन समस्त कविताओं का द्योतक है, जो 1918 से '36 ई॰ के बीच लिखी गईं।...यहाँ हमें यह न भूलना चाहिए कि छायावाद उस राष्ट्रीय जागरण की काव्यात्मक अभिव्यक्ति है जो एक ओर पुरानी रूढ़ियों से मुक्ति चाहता था और दूसरी ओर विदेशी पराधीनता से।"[8]

नामवर सिंह अपनी व्याख्या को विस्तार देते हुए आगे स्पष्ट करते हैं कि जैसे-जैसे राष्ट्रीय जागरण में विकास होता गया वैसे-वैसे इसकी काव्यात्मक अभिव्यक्ति भी विकसित होती गई। इसका परिणाम यह हुआ कि एक काव्यांदोलन के रूप में 'छायावाद' नाम का भी अर्थ विस्तार होता गया। जिन कविताओं के आधार पर 'छायावाद' का नामकरण हुआ था उनकी विषयवस्तु तथा रूप-विन्यास का भी विस्तार हुआ। इस प्रकार देखा जाय तो छायावाद के आरंभिक अर्थ में भी क्रमशः व्यापकता का समावेश होना स्वाभाविक माना जा सकता है।[9]

छायावाद के प्रमुख कवि[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करें]

छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों के रूप में जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा का नाम प्रतिष्ठित है।

संदर्भ[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करें]

  1. नामवर सिंह 1955, p. 11.
  2. नामवर सिंह 1955, p. 12.
  3. नामवर सिंह 1955, p. 13.
  4. शुक्ल, रामचंद्र. हिंदी साहित्य का इतिहास. काशी: नागरी प्रचारिणी सभा. p. 668 – via विकिस्रोत.  [स्कैन विकिस्रोत कड़ी]
  5. 5.0 5.1 नामवर सिंह 1955, p. 15.
  6. द्विवेदी, हजारीप्रसाद (1952). हिन्दी साहित्य : उद्‌भव और विकास (2006 ed.). नई दिल्ली: राजकमल प्रकाशन प्रा॰ लि॰. p. 242. ISBN 81-267-0035-1. 
  7. शंभुनाथ सिंह (1958). वर्मा, धीरेन्द्र, ed. हिन्दी साहित्य कोश (2015 ed.). वाराणसी: ज्ञानमण्डल लिमिटेड. p. 252. 
  8. नामवर सिंह 1955, p. 16-17.
  9. नामवर सिंह 1955, p. 17.

स्रोत[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करें]

  • नामवर सिंह (1955), छायावाद (बीसवाँ संस्करण 2018), राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, ISBN : 978-81-267-0736-2.