भाषाविज्ञान/अर्थ परिवर्तन के कारण और दिशाएँ

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भाषा मानव व्यवहार का प्रमुख साधन है। मनुष्य स्वयं परिवर्तनशील है इसलिए उनका प्रमुख व्यवहार भाषा भी परिवर्तनशील है। भाषा में परिवर्तन की यह प्रक्रिया उसके अंगों को भी प्रभावित करती है। अर्थ भी उससे अप्रभावित नहीं रहता। अर्थ परिवर्तन के कारण और दिशाओं का यहां संक्षेप में वर्णन प्रस्तुत है।

अर्थ परिवर्तन की दिशाएँ[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करें]

अर्थविज्ञान के प्रमुख चिंतक ब्रील के अनुसार अर्थ का विकास अथवा परिवर्तन की मुख्यतः तीन दिशाओँ[1] में होता है-

1) अर्थ विस्तार (expansion of meaning)

वे शब्द जो पहले सीमित अर्थ में प्रयोग होते हों, लेकिन बाद में उनके अर्थ में विस्तार देखने को मिलता है और उनका अर्थ व्यापक हो जाता है। इसे ही अर्थ विस्तार कहते हैं। प्रवीण का अर्थ पहले केवल वीणा बजानेवाले के लिए प्रयुक्त होता था किंतु धीरे-धीरे इस शब्द का अर्थ विस्तार हुआ और बाद में चल कर किसी भी काम में निपुण व्यक्ति को प्रवीण कहा जाने लगा। इसी प्रकार कुशल शब्द का अर्थ था 'कुश लाने वाला', लेकिन बाद में यह 'चतुर' का पर्याय बन गया।

2) अर्थ संकोच (contraction of meaning)

जिस प्रकार अर्थ का विस्तार होता है उसी प्रकार कई बार व्यापक अर्थ वाले शब्दों के अर्थों में संकोच भी होता है। जैसे- जलज अर्थ होता है 'जल से उत्पन्न' पर जल से उत्पन्न होने वाली सभी चीजों को जलज नहीं कहेंगे, यह शब्द कमल के अर्थ में रूढ़ हो चुका है।

3) अर्थादेश (transference of meaning)

अर्थ विस्तार और अर्थ संकोच के अलावा कई बार शब्द के अर्थ बिल्कुल बदल भी जाते हैं। जैसे असुर शब्द देवता का वाचक था पर आज वह दैत्यों का वाचक हो गया है। इसी तरह आकाशवाणी का अर्थ देववाणी था पर अब वह भारतीय रेडियो के लिए इस्तेमाल होता है।

इसके साथ अर्थोत्कर्ष (elevation of meaning) और अर्थापकर्ष (deterioration of meaning) भी अर्थ परिवर्तन की दिशा निर्धारित करते हैं। अर्थोत्कर्ष में निकृष्ट अर्थ में प्रयुक्त होने वाला शब्द उत्कृष्ट अर्थ का बोधक हो जाता है। जैसे - साहस, मुग्ध आदि। पहले साहसी उसे कहा जाता था जो चोर-डकैत और जघन्य अपराध में लिप्त हो, लेकिन आगे चलकर वही धीरता और वीरता का परिचायक बन गया। वैसे ही मुग्ध पहले मूर्ख का बोधक था बाद में वही मोहित होने के अर्थ में परिवर्तित हो गया।

अर्थ परिवर्तन के कारण[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करें]

1. भौगोलिक परिवेश की भिन्नता
भौगोलिक परिवेश की भिन्नता के कारण एक ही शब्द के हमें अलग-अलग रूप देखने को मिलते हैं क्योंकि एक ही शब्द का हर जगह एक ही अर्थ हो यह जरूरी नहीं। जैसे 'कॉर्न' (corn) का अर्थ ब्रिटेन में गेहूँ है तो अमेरिका में मक्का।
2. सामाजिक परिवेश का परिवर्तन
समाज के विभिन्न जगहों पर एक ही शब्द के भिन्न अर्थ देखने को मिलते हैं। जैसे घर पर Father और चर्च में Father का एक ही अर्थ नहीं होता।
3. धार्मिक परिवेश में परिवर्तन
धर्म का प्रभाव भी शब्दों के अर्थ में पड़ता है। धर्म को केन्द्र में रखकर जो लड़ते हैं वे अक्सर अपने नकारात्मक शब्दों को अपने विरोधी धर्म से जोड़ने का प्रयास करते है। एक उदाहरण हैं 'काफ़िर' (श्रद्धा न रखने वाला) जिसे कभी-कभी इस्लाम को मानने वाले हिन्दुओं से जोड़ते हैं। उसी तरह आज हिन्दुओं के यहां 'जेहाद' (पवित्र उद्देश्य के साथ संघर्ष करना) शब्द का अर्थ आतंकवाद से जोड़ा जाने लगा है।
4. राजनीतिक स्थिति का प्रभाव
राजनीति भी हमारे शब्दों के अर्थ को प्रभावित करते हैं। जैसे आजकल 'जय हिन्द' और 'जय श्री राम' का अर्थ राजनीतिक प्रभाव में आकर अपने मूल अर्थ से हटता ‌जा रहा है।
5. नए भौतिक साधन
भौतिक साधनों में परिवर्तन के साथ शब्दों के अर्थ भी बदलते हैं। जैसे विज्ञान ने शीशे के दर्पण बना दिए और हमने शीशा धातु के आधार पर दर्पण का नामकरण शीशा कर दिया।
6. शब्द-प्रयोग की अधिकता
किसी-किसी शब्द के बहुत अधिक प्रयोग कर देने से भी उसका विशिष्ट अर्थ खो जाता है। जैसे - आचार्य, श्रीमान, नेता, महाजन, शहीद आदि।
7. लक्षणा-व्यंजना का प्रयोग
लक्षणा और व्यंजना भी अर्थ-परिवर्तन के प्रमुख कारणों में गिने जा सकते हैं। हम जानते हैं कि लक्षणा से शब्दार्थ में प्रभाव पैदा हो जाता है तथा व्यंजना से अर्थ विशिष्ट और नवीन बन जाता है। जैसे कोई कहे कि वह अपने गाँव का शेर है, तो इसमें शेर का अर्थ पशु विशेष न होकर वीर और प्रभावशाली माना जाएगा। वास्तव में व्यंजना के कारण ही कहावतें, लोकोक्तियाँ व आलंकारिक प्रयोग आदि विलक्षण अर्थबोध कराने में सफल हो पाते हैं।
8. शब्दों के तद्भव रूप
कई बार शब्दों के तद्भव रूप भी मूल अर्थ में परिवर्तन उपस्थित कर देते हैं। जैसे - 'श्रेष्ठ' (महान, श्रद्धेय) का तद्भव रूप 'सेठ' आगे चलकर व्यापारी के अर्थ में परिवर्तित हो गया। 'भद्र' (सुसंस्कृत) का तद्भव रूप 'भद्दा' (असभ्य, अश्लील, बेडौल) विपरीतार्थक हो गया। इसी प्रकार 'स्तन' (स्त्री के संबंध में) का तद्भव रूप 'थन' अब केवल पशुओं के संदर्भ में प्रयोग किया जाता है।
9. शब्दकोशीय पर्याय
शब्दकोश में प्रायः एक शब्द का बोध कराने के लिए अनेक पर्याय दे दिए जाते हैं। कभी-कभी इन पर्यायों से भी अर्थ में पर्याप्त अंतर आ जाता है। जैसे - चेक (cheque) और ड्राफ्ट (draft) शब्द के ऐसे पर्याय दिये जाते हैं कि उसके मूल अर्थ में ही परिवर्तन हो जाता है। जैसे - चेक के लिए देयक, धनादेश, हुंडी आदि वहीं ड्राफ्ट के लिए भी धनादेश, हुंडी का प्रयोग करना। अब यहाँ हुंडी का प्रयोग केवल ड्राफ्ट के अर्थ में होना चाहिए। शब्दकोशीय पर्याय के कारण ही लोग हुंडी से चेक का अर्थ लगा लेते हैं।
10. सामान्य के लिए विशेष का प्रयोग
अनेक शब्द ऐसे हैं जिनका प्रयोग पहले पदार्थ विशेष के ही अर्थ में किया जाता है लेकिन बाद में सामान्य पदार्थों के लिए भी किया जाने लगा। जैसे - सब्ज़ी, स्याही आदि। सब्ज़ का अर्थ होता है हरा इसलिए सब्ज़ी से हरी तरकारी का अर्थबोध होता था। हालाँकि अब आलू, प्याज़ आदि के लिए भी सब्ज़ी का प्रयोग किया जाता है। वैसे ही स्याही का अर्थ होता है काला। पहले काले रंग की रोशनाई के लिए ही स्याही का प्रयोग होता था लेकिन अब किसी भी रंग की रोशनाई के लिए स्याही का प्रयोग किया जाने लगा है।
11. अन्य भाषाओँ का अधूरा ज्ञान
अन्य भाषाओं के अधूरे ज्ञान से भी अर्थ परिवर्तन हो जाता है। उर्दू में ख़ुलासा का अर्थ संक्षिप्त करना है किंतु हिंदी में इसे व्याख्या या विस्तार से बताने के अर्थ में प्रयोग किया जाने लगा है। वैसे ही विरोध का बोधक सही शब्द मुख़ालफत है लेकिन हिंदी में अक्सर ख़िलाफ़त का प्रयोग कर दिया जाता है जो कि ख़लीफ़ा से संबंधित है। कई बार तो अनर्थकारी अर्थ तक प्रचलित हो जाते हैं। जैसे - जनक-सुता = पिता की पुत्री। हालाँकि व्यक्तिवाचक संज्ञा 'जनक' की पुत्री थीं 'सीता'। बौद्ध जातक में तथा उसके आधार पर पालि-चीनी-कोश में 'जनक' (व्यक्तिवाचक संज्ञा) का अर्थ हो गया 'पिता' तथा 'जनक-सुता' का अर्थ हो गया 'पिता की पुत्री' अर्थात् बहन। यहाँ जो अर्थ परिवर्तन हुआ उसके आधार पर 'राम ने जनक-सुता से विवाह किया' का अर्थ होगा 'राम ने अपनी बहन से विवाह किया', जो कि बेहद मूर्खतापूर्ण होगा।
12. अन्य कारण
उपर्युक्त कारणों के साथ-साथ कई अन्य कारण भी हैं जिनसे अर्थ-परिवर्तन घटित होता है। श्रुतिमधुरता या सुश्रव्यता (euphemism) के कारण भी अर्थ-परिवर्तन होता है, क्योंकि मनुष्य कई बार लज्जा, घृणा या अमंगल की आशंका में भी कुछ शब्दों का प्रयोग करने में झिझकता है। कई बार कवियों की मनमानी तथा अभिनव प्रयोग से भी अर्थ परिवर्तन घटित हुए (पंत का गांधी जी के लिए 'अछूत' का प्रयोग छुआछूत से दूर के अर्थ में, निराला का अमावस्या के लिए 'अमानिशा' का प्रयोग आदि)। भावुकता या भावात्मक बल के कारण भी अर्थ-परिवर्तन संभव है। जैसे - दुष्ट, शैतान, गधा आदि का प्रयोग प्रेम और क्रोध दोनों स्थितियों में होना। ठीक इसी प्रकार भीषण, भयंकर, प्रचंड या दुर्दांत का प्रयोग अच्छे अर्थों में अतिशय भाव प्रदर्शन के लिए भी किया जाता है। कई बार अंधविश्वास (चेचक को माता कहना) भी अर्थ-परिवर्तन का कारण बन सकता है। साहचर्य संबंध (सूरत के साहचर्य के कारण तंबाकू को 'सूरती' कहना) तथा विनम्रता का प्रदर्शन (भिखारी को राजा, प्रधानमंत्री को प्रधानसेवक, झोपड़ी को महल या हवेली को कुटिया कहना) आदि अनेक कारण हैं जिनसे अर्थ-परिवर्तन होता है।

संदर्भ[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करें]

  1. सक्सेना, बाबूराम (1943). सामान्य भाषाविज्ञान (PDF) (1947 ed.). प्रयाग: हिन्दी साहित्य सम्मेलन. p. 101. 

सहायक पुस्तकें[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करें]

  1. ब्लूमफील्ड, लियोनार्ड (1968). भाषा (Language का हिंदी अनुवाद). अनुवाद - विश्वनाथ प्रसाद, दिल्ली: मोतीलाल बनारसीदास.
  2. तिवारी, भोलानाथ. भाषाविज्ञान (1951 ed.). इलाहाबाद: किताब महल प्राइवेट लिमिटेड.
  3. शर्मा, देवेन्द्रनाथ; शर्मा, दीप्ति (1966). भाषाविज्ञान की भूमिका (2018 ed.). दिल्ली: राधाकृष्ण प्रकाशन. ISBN 978-81-7119-743-9.
  4. झा, सीताराम (1983). भाषा विज्ञान तथा हिन्दी भाषा का वैज्ञानिक विश्लेषण (2015 ed.). पटना: बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी. ISBN 978-93-83021-84-0.