भाषाविज्ञान/शब्द और अर्थ का संबंध

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भाषिकी चिंतन में यह प्रश्न अनादि काल से उठता रहा है कि शब्द और अर्थ का क्या संबंध है? क्यों पानी कहने से तरल विशेष और शेर कहने से पशु विशेष का ही बोध होता है? विचार करें तो शब्द और अर्थ का कोई स्वाभाविक एवं सहज संबंध नहीं है। हम जानते हैं कि भाषा यादृच्छिक ध्वनि प्रतीकों की व्यवस्था है अर्थात् किसी शब्द का क्या अर्थ होगा यह एक समाज द्वारा मान लिया गया है। पानी कहने पर तरल विशेष का बोध और शेर कहने पर पशु विशेष का ही बोध होता है, क्योंकि इन शब्दों के लिए यह अर्थ एक समाज द्वारा मान लिया गया हैं।

रामचरितमानस में तुलसीदास ने शब्द और अर्थ के संबंध में कहा है - 'गिरा अरथ जल बीचि सम कहियत भिन्न न भिन्न'। तुलसी के अनुसार शब्द और अर्थ का संबंध जल और लहरों की भांति है जिसे भिन्न-भिन्न नहीं कहा जा सकता। लहरों से ही प्रतीत होता है कि जल में कितना प्रवाह या हलचल है। जल और लहरों के समान शब्द और अर्थ का संबंध-विश्लेषण करें तो यह मुख्यतः तीन कोटि का ठहरता है। (क) वाच्य-वाचक संबंध, (ख) बिंब-प्रतिबिंब संबंध तथा (ग) अन्योन्याश्रय संबंध। हमें सदैव यह ध्यान रखना चाहिए कि इन संबंधों में अनुभव और लोकसिद्धि निहित है। अनुभव और लोक द्वारा उनकी सिद्धि या पुष्टि से ही शब्द और अर्थ एकाकार होकर अपना उद्देश्य पूर्ण कर पाते हैं। भर्तृहरि ने इसीलिए कहा है कि 'एकस्यैवात्मनो भेदौ शब्दार्थावपृथक्स्थितौ' (वाक्यपदीय, 2-31) अर्थात् शब्द और अर्थ एक ही आत्मा के भेद की तरह अपृथक् या संयुक्त रूप में रहते हैं। तात्विक दृष्टि से दोनों एक ही हैं।[1]

पारिभाषिक शब्दावली में ध्वनि के साथ वस्तु का संबंध स्थापित करना 'संकेतग्रह' कहलाता है। 'शब्दशक्तिप्रकाशिका' (जगदीश) में अर्थबोध या संकेतग्रह के आठ साधन[2] माने गये हैं--

व्यवहार
व्यवहार द्वारा हम बचपन से कई शब्दों के अर्थ जान पाते हैं। बचपन में हम माता-पिता की सहायता से कई वस्तुओं के तरफ़ इशारा करके उनका ज्ञान लेते हैं। जैसे - कोई बालक चूल्हे की तरफ़ इशारा करके अपनी माँ से उसके संबंध में पूछता है तो उसे ज्ञात होता है कि अमुक वस्तु का नाम चूल्हा है।
आप्तवाक्य
कई शब्द जैसे ईश्वर, धर्म, पुण्य आदि ऐसे हैं जिनको समझने की शक्ति हमारे पास नहीं होती। अतः ऐसे शब्दों के अर्थ के लिए हमें ज्ञानी व्यक्तियों का सहारा लेना पड़ता है जो इनका जानकर हो।
उपमान या सादृश्य
कई चीजें ऐसी होती हैं जिनके अर्थ ग्रहण के लिए हम अपने किसी परिचित शब्द के अर्थ की उपमा देकर उसको समझते हैं। जैसे - किसी ने खच्चर के बारे में सुन रखा हो कि वह घोड़े और गधे के समान होता है। अब कभी वह खच्चर देखेगा तो घोड़े और गधे की उपमा से उसको समझ जाएगा।
वाक्य शेष
कुछ शब्दों के अर्थ के लिए हमें वाक्य के शेष भाग का सहारा लेना पड़ता है। जैसे - 'पवन आ रहा है।' इसमें वाक्य के शेष भाग द्वारा पता चलता है कि पवन का अर्थ यहाँ हवा ना होकर किसी लड़के का नाम है।
विवृत्ति
कई शब्द ऐसे होते हैं जिनके अर्थ की प्राप्ति उनकी व्याख्या द्वारा संभव हो पाता है। जैसे - रीति, अद्वैत आदि।
सान्निध्य
हम कई शब्दों का ज्ञान उसके आस-पास के शब्दों के आधार पर ग्रहण कर लेते हैं। जैसे - गुलाब, चमेली, नरगिस, गेंदा। इसमें नरगिस का अर्थ जो नहीं जानता होगा वह भी बाक़ी फूलों के आधार पर उसका अर्थ भी फूल रूप में ग्रहण कर लेगा।
व्याकरण
व्याकरण के ज्ञान के द्वारा हम मूल शब्द से बने दूसरे शब्दों का अर्थ ग्रहण कर सकते हैं। जैसे - 'जाना' शब्द का भूतकाल में 'गया' रूप में इस्तेमाल होता है, ऐसे में जो व्याकरण से परिचित होगा वह 'गया' का अर्थ आराम से ग्रहण कर लेगा।
कोश
कोश द्वारा हम कई अज्ञात शब्दों का अर्थ ग्रहण करते है। जैसे - जिसको प्रध्वंसी का अर्थ नहीं मालूम होगा वह कोश द्वारा उसका अर्थ नाशवान ग्रहण कर लेगा।

पाश्चात्य परंपरा में अर्थग्रह के तीन साधन माने गए हैं। लियोनार्ड ब्लूमफील्ड ने 'भाषा' (Language) में इसका उल्लेख व्यवहार (Demonstration), विवरण (Circumlocution) तथा अनुवाद (Translation) के रूप में किया है।[3]

संदर्भ[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करें]

  1. झा, सीताराम (1983). भाषा विज्ञान तथा हिन्दी भाषा का वैज्ञानिक विश्लेषण (2015 ed.). पटना: बिहार हिन्दी ग्रन्थ अकादमी. p. 211. ISBN 978-93-83021-84-0. 
  2. शर्मा, देवेन्द्रनाथ; शर्मा, दीप्ति (1966). भाषाविज्ञान की भूमिका (2018 ed.). दिल्ली: राधाकृष्ण प्रकाशन. p. 256-59. ISBN 978-81-7119-743-9. 
  3. ब्लूमफील्ड, लियोनार्ड (1968). "अर्थ". भाषा (PDF) (in हिंदी). दिल्ली: मोतीलाल बनारसीदास. p. 162-63.