भाषाविज्ञान/भाषा और बोली का अंतरसंबंध

विकिविश्वविद्यालय से
Jump to navigation Jump to search

भाषा और बोली तत्वतः भिन्न न होकर मानव व्यवहार की भिन्न-भिन्न अवस्थाओं का संकेत करती हैं। वास्तविक रूप में ऐसी कोई भी निश्चयात्मक कसौटी नहीं है जिसके आधार पर भाषा और बोली में अंतर किया जा सके। कुछ विद्वानों (विलियम लेबोव और बेसिल बर्नस्टीन आदि) ने तो भाषा और बोली का अंतर मूल रूप से 'भाषावैज्ञानिक' नहीं, बल्कि 'समाजभाषावैज्ञानिक' (Sociolinguistic) माना है। चूँकि सामाजिक संपर्क, भौगोलिक-विस्तार, परिष्कार, ऐतिहासिक विकास आदि कारकों का विचार भाषाविज्ञान का विषय है इसलिए भाषा और बोली के अंतरसंबंधों के सैद्धांतिक प्रतिपादन की संभावना बन जाती है। भाषा और बोली के बीच स्पष्ट विभाजक रेखा खींचने से बेहतर है कि उनके आपसी संबंधों का विश्लेषण किया जाय। सामान्यतया जिसे भाषा और बोली का अंतर माना जाता है, वही उनका एक-दूसरे में संक्रमण का कारण होता है। भाषा और बोली के अंतरसंबंधों[1] को हम निम्नलिखित दृष्टियों से समझ सकते हैं -

बोधगम्यता
भाषा और बोली का सबसे व्यावहारिक अंतर बोधगम्यता का है। यदि दो लोग आपस में अपने-अपने क्षेत्र की बोलियों में बात कर रहे हों और उन्हें समझने में कोई विशेष कठिनाई न हो रही हो तो कहा जा सकता है कि दोनों एक ही भाषा की बोलियों का प्रयोग कर रहे हैं। यदि वे एक दूसरे की बात को न समझ पा रहे हों तो इसका आशय है कि वे अलग-अलग भाषा से संबंध रखते हैं।
भौगोलिक विस्तार
भाषा का भौगोलिक क्षेत्र प्रायः विस्तृत होता है जबकि बोली का सीमित। इसका मूल कारण है बोली का किसी क्षेत्र विशेष में ही व्यवहार किया जाना, जबकि भाषा क्षेत्र विशेष को विभिन्न क्षेत्रों के साथ जोड़ने के लिए पुल का काम करती है।
व्याकरण
भाषा का प्रायः एक निश्चित व्याकरण होता है जबकि बोली का निश्चित व्याकरण नहीं होता। यही कारण है कि भाषा के संबंध में शुद्धता का ध्यान तो प्रायः रखा जाता है लेकिन बोली में शुद्धता-अशुद्धता की विशेष चिंता नहीं की जाती।
शासकीय मान्यता
शासकीय मान्यता भाषा और बोली में एक बड़ा अंतर पैदा करती है। जहाँ भाषा को शासकीय मान्यता प्राप्त होती है वहीं बोली को प्राप्त नहीं होती। इसके बहुधा राजनीतिक कारण भी हुआ करते हैं। भोजपुरी जैसी समृद्ध भाषा को शासकीय मान्यता न (भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं) मिलने के कारण ही अभी तक बोली समझा-समझाया जाता है। कभी-कभी तो केवल शासकीय मान्यता प्राप्त हो जाने से ही बोली को भाषा का दर्जा प्राप्त हो जाता है। जैसे एक शासकीय आदेश मात्र से उत्तरी चीन की एक बोली मंदारिन पूरे चीन की मानक भाषा बन गई।
प्रयुक्ति
भाषा और बोली में एक महत्त्वपूर्ण अंतर प्रयुक्ति या प्रयोग क्षेत्र की व्यापकता से संबंधित है। भाषा समाज में शिक्षा, साहित्य, सरकारी कामकाज, कला-संस्कृति, मनोरंजन, खेल, पत्रकारिता, विज्ञान, राजनीति आदि का समर्थ माध्यम होती है जबकि बोली जीवन के साधारण पक्षों की अभिव्यक्ति ही कर पाती है। हालाँकि कला-संस्कृति की दृष्टि से देखा जाय तो बोलियों में प्रचुर मात्रा में लोकसाहित्य संरक्षित है। बावजूद इसके प्रयुक्तियों के मामले में बोली भाषा से पीछे छूट जाती है।

संदर्भ[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करें]

  1. देवेन्द्रनाथ शर्मा, दीप्ति शर्मा, भाषाविज्ञान की भूमिका (2018), राधाकृष्ण प्रकाशन, दिल्ली, पृष्ठ - 55-64 ISBN : 978-81-7119-743-9